जैसे काशी और आकाशदीप का संबंध है वैसे ही एक साहित्यकार का उसके साहित्य से सम्बन्ध होता है। जैसे जैसे वह पुरातन होता जाता है वैसे वैसे उसमे निखार आता जाता है। जिस प्रकार से कार्तिक की सिहरती संध्याओं के बीच पतित पावनी के घाटों पर टंगे हुए आकाशदीप गंगा के शान्त स्थिर जल में झिलमिलाती प्रतिच्छवियों की अनुपम-अभिराम छटा बिखेरते रहते हैं और जिसे देखने के लिए देश विदेश के लोग सहज ही उसके घाटों पर आते रहते हैं उसी प्रकार एक अच्छी रचना का वैशिष्ट किसी को भी अपनी ओर आकृष्ट करता है । संवाहक साझा संकलन भी कुछ इसी तरह से अनेक आकाशदीपों की मोहक छटा को साहित्य की भागीरथी पर बिखेरता है। संवाहक की परिकल्पना पूर्णतयः विमल चन्द्राकर की थी जिसमें सहयोगी के तौर पर कुशल शिल्पी की भाँति अमरेश गौतम अयुज पूरी दृढ़ता व ईमानदारी से जुटे रहे और साहित्यिक बगिया के अनेक रचनाकारों को लेकर एक साझा संकलन निकालने का श्रमसाध्य प्रयास किया है। इस संग्रह में कुल बाइस रचनाकार सम्मिलित हैं। जिनमें कुछ परिपक्व हैं तो कुछ ने अभी कुछ एक वर्षों से ही लिखना प्रारम्भ किया है। इस प्रकार से नये-पुराने का तादात्म्य स्थापित करने का एक अच्छा प्रयास है। यद्यपि इनमें कई रचनाकार बिल्कुल नये हैं परन्तु उनकी रचनाधर्मिता काफी हद तक परिपक्वता की सीमाओं को स्पर्श करने का प्रयास करती है। पुराने रचनाकारों की रचनाधर्मिता पहले से भी अधिक निखरकर उभरी है। संवाहक इन्हीं दोनों पीढ़ियों की रचनाओं को धारण कर अपनी सार्थकता सिद्ध करती है। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि संवाहक साझा संग्रह साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा।